वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

वो तुम्हारे भीतर वाली दुनिया कभी शांत, स्थिर, मूक सी, आडंबर को ताकते हुए निस्तब्ध रहकर सिद्धी पाती है। कभी अचानक... उपद्रवी सी होकर हंगामा मचाती है। धरातल खंगर सा लगे पर भीतर अश्रु बहाती है। बेदाम, दुस्साहसी बन कर आज़ादी चाहती है। मगर तुम उसका हाथ थाम लेते हो लम्बा सा सुफियाना भाषण देकर, … Continue reading वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

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फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

खुले मैदानों से निकलकर फ़हरिस्तों मे कैद हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई सीलन भरी दीवार पर धूप की लकीर खींचा करती थी ज़िन्दगी कभी थोड़े मे ही खुशियां सींचा करती थी आज बेहिसाब बकिट लिस्टों के बारे मे हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई हर एक … Continue reading फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

क्यों दंभ हूँ मैं?

मैं तो एक कण हूँ विशाल समय का एक क्षण हूँ, धरातल पर बहता सा एक भ्रम हूँ, शायद मैं छल हूँ, बस आज हूँ नही कल हूँ मैं। मैं अथाह सागर की सिर्फ एक बूंद हूँ, रत्ती भर हूँ रेत मे, मिट्टी नही धूल हूँ, पर्वत की चट्टान नही ज़र्रे सी लुप्त हूँ, ब्रह्माण्ड … Continue reading क्यों दंभ हूँ मैं?