पतझड़

सुनहरा, लाल, भूरा खूबसूरती का यह रंग मुझे लगता है अधूरा। क्यों पत्तियाँ गिरा देते हैं पेड़ जर्जर होते जीवन को अब निर्जन भी बना देते हैं पेड़। अवसान जैसे खुद की ही बड़ाई करता हो मौत की अजीब सी नुमाइश करता हो। परिणति का यह कैसा है स्वरूप जो मन को कर देता है … Continue reading पतझड़

खोल दो…

खोल दो भींची हुई मुट्ठियाँ जकड़े हुए अचम्भों के दरवाज़े विस्मय पर लगे ताले। मान लो कि लोमड़ी और गीदड़ का ब्याह है और पहाड़ के पीछे इंद्रधनुष छिपा है। दिखाने दो दिल को उछाल पट पर कलाबाजियाँ सलीके से आखिर मिला क्या है। सहला लो थोड़ी सी बेपरवाहियाँ विवेक में भला ऐसा क्या है। … Continue reading खोल दो…

वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

वो तुम्हारे भीतर वाली दुनिया कभी शांत, स्थिर, मूक सी, आडंबर को ताकते हुए निस्तब्ध रहकर सिद्धी पाती है। कभी अचानक... उपद्रवी सी होकर हंगामा मचाती है। धरातल खंगर सा लगे पर भीतर अश्रु बहाती है। बेदाम, दुस्साहसी बन कर आज़ादी चाहती है। फिर तुम उसका हाथ थाम लेते हो। लम्बा सा सुफियाना कलाम सुनाकर, … Continue reading वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया