तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है…

तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है दिन और साल, दोनो चुरा ले जाता है। इस बार फिर सर्दी की खटखटाहट सुन रही हूँ बांवरे दिसंबर की आहट सुन रही हूँ। देखी होगी तुमने भी उसकी खुदगर्ज़ी; सिहरन भरी रातों को सिगड़ी का साथी बना देता है कभी प्यार को शाल की तरह ओढ़ा देता है … Continue reading तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है…

पतझड़

सुनहरा, लाल, भूरा खूबसूरती का यह रंग मुझे लगता है अधूरा। क्यों पत्तियाँ गिरा देते हैं पेड़ जर्जर होते जीवन को अब निर्जन भी बना देते हैं पेड़। अवसान जैसे खुद की ही बड़ाई करता हो मौत की अजीब सी नुमाइश करता हो। परिणति का यह कैसा है स्वरूप जो मन को कर देता है … Continue reading पतझड़

मुझे भ्रम है

यूँ ही एक भ्रम सा पाल रखा है कि जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है और स्थायी भी । हिमालय की ऊँचाईयों पर बसने वाले जीव शायद ही घाटियों की खोज खबर रखते हैं। और कहीं पहुँचने की जल्दी में भागती हुई नदी क्या जाने कि पर्वत की भाँति अचल रहना भी कुछ होता है। … Continue reading मुझे भ्रम है

छोटे शहरों को समर्पित

छोटे शहर थोड़ा धीरे चलते हैं । शायद उनकी घड़ियों की धड़कने तेज़ नहीं होतीं । धूप सुस्ताते हुए बरामदों में झाँकती है। और सुबह-सुबह सड़कें कुछ चंद ही कदम चलती हैं । धीमे-धीमे सूरज चढ़ता है तो काफिला आगे बढ़ता है । मंज़िलें पास ही होती हैं। फिर भी उन्हें तय करने में घण्टों … Continue reading छोटे शहरों को समर्पित