फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

खुले मैदानों से निकलकर फ़हरिस्तों मे कैद हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई सीलन भरी दीवार पर धूप की लकीर खींचा करती थी ज़िन्दगी कभी थोड़े मे ही खुशियां सींचा करती थी आज बेहिसाब बकिट लिस्टों के बारे मे हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई हर एक … Continue reading फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

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