Category: Poetry

Music of the heart!!!

तो क्या मिल जाते हैं चुप रहने वाली औरतों को सौ सुख?

कहते हैं वो घर सुखी होते हैंजहां औरतें कम बोलती हैं,उनकी चुप्पी की बुनियादपर खड़े होते हैंखुशियों के शीश महल, भर जाती हैं उनकी झोलियाँहज़ारों सुखों से।एक चुप परवो कहते हैं नासौ सुख वारते हैं…और ताउम्र की चुप्पी पर? गुज़र जाती हैउनकी ज़िंदगीसिर्फ एक… Continue Reading “तो क्या मिल जाते हैं चुप रहने वाली औरतों को सौ सुख?”

पतंगों की जंग

अब शीत लहर घबराई सी ढूंढे नए छोर, सूरज की किरणों को देखो खींचो पतंग की डोर ! आसमान में रंग हैं बिखरे, बिखरे चहुँ ओर मुंडेरों के पीछे से सब मचा रहे हैं शोर! छतों के ऊपर देखो कैसा मेला लगा है यार… Continue Reading “पतंगों की जंग”

रहती है सिर्फ याद

रास्ते सफर बन जाते हैं ढूंढ लेते हैं नए सिरे अंत से पहले। बालों में उलझा हवा का झोंका झटक जाता है, समय की छलनी से मैं देखती हूँ पहाडों पर बिखरती धूप। मुट्ठी में भर लायी थी जो, उस सुबह की भीनी सुगंध… Continue Reading “रहती है सिर्फ याद”

सूर्य पर भी ग्रहण आता है

देखो न सूर्य पर भी ग्रहण आता है पल भर के लिए ही सही उसका बिम्ब भी छिप जाता है। चाँद को अपनी छाया पर गुमान है मगर यह दिवाकर अभी भी आग के गोले के समान है हीरे की अंगूठी सा दमकता है… Continue Reading “सूर्य पर भी ग्रहण आता है”

FAILURE

(Here is an attempt at writing an acrostic poem) Fallen and disgraced Again I rise Like a Phoenix Undaunted and Resolute until Eternity! (All rights reserved)

The Tale of the Sergeant and his Men

“Raise your right hand,” cried the sergeant who stood facing the squad, They complied immediately but only to invite his wrath. “You raise your left, when I say right,” he angrily exclaimed, “I see that you haven’t been, properly trained. The right is what… Continue Reading “The Tale of the Sergeant and his Men”

तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है…

तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है दिन और साल, दोनो चुरा ले जाता है। इस बार फिर सर्दी की खटखटाहट सुन रही हूँ बांवरे दिसंबर की आहट सुन रही हूँ। देखी होगी तुमने भी उसकी खुदगर्ज़ी; सिहरन भरी रातों को सिगड़ी का साथी बना… Continue Reading “तुम कहते हो दिसंबर खुदगर्ज़ है…”

पतझड़

सुनहरा, लाल, भूरा खूबसूरती का यह रंग मुझे लगता है अधूरा। क्यों पत्तियाँ गिरा देते हैं पेड़ जर्जर होते जीवन को अब निर्जन भी बना देते हैं पेड़। अवसान जैसे खुद की ही बड़ाई करता हो मौत की अजीब सी नुमाइश करता हो। परिणति… Continue Reading “पतझड़”

Rusty and Me

It’s almost midnight. I have a new picture as my facebook profile. On my lap lies a story from ‘Potpourri‘. Ruskin is Rusty in ‘Love and Cricket’ where he meets his beloved Sushila after more than a decade. The notifications on the mobile disturb… Continue Reading “Rusty and Me”

Politics and Tea

The scholarly commoners glibly discussed politics The course and recourse of History Their insights Several wrongs and a right! What shall become and who shall be They spoke at length over cups of tea. They lambasted statesmen and hailed democracy Chartered a plan for… Continue Reading “Politics and Tea”

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