Category: हिंदी

किताबों की नौकरी!

विनोद बाबु किताबों पर पड़ी धूल झाड़ रहे थे। तीस सालों से शिमला की स्टेट लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन थे पर आज उनका यहां आखिरी दिन था। ‘अगर एक महीने में आप एक भी मेंबर बना पाए तो हम लाइब्रेरी बंद नही करेंगे।’ ऐसा कहा… Continue Reading “किताबों की नौकरी!”

बदलाव

इस नए साल के आगमन पर मैंने ज़्यादा संदेश नहीं भेजे। न ही ज्यादा लोगों को फोन किया । दरअसल यह नया साल मेरे जीवन में भी काफी कुछ नया लेकर आया तो उसी उधेड़ बुन में व्यस्त थी। कुछ अजीबोग़रीब सी स्थिति लग… Continue Reading “बदलाव”

मुझे भ्रम है

यूँ ही एक भ्रम सा पाल रखा है कि जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है और स्थायी भी । हिमालय की ऊँचाईयों पर बसने वाले जीव शायद ही घाटियों की खोज खबर रखते हैं। और कहीं पहुँचने की जल्दी में भागती हुई नदी क्या… Continue Reading “मुझे भ्रम है”

छोटे शहरों को समर्पित

छोटे शहर थोड़ा धीरे चलते हैं । शायद उनकी घड़ियों की धड़कने तेज़ नहीं होतीं । धूप सुस्ताते हुए बरामदों में झाँकती है। और सुबह-सुबह सड़कें कुछ चंद ही कदम चलती हैं । धीमे-धीमे सूरज चढ़ता है तो काफिला आगे बढ़ता है । मंज़िलें… Continue Reading “छोटे शहरों को समर्पित”

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