पतझड़

सुनहरा, लाल, भूरा खूबसूरती का यह रंग मुझे लगता है अधूरा। क्यों पत्तियाँ गिरा देते हैं पेड़ जर्जर होते जीवन को अब निर्जन भी बना देते हैं पेड़। अवसान जैसे खुद की ही बड़ाई करता हो मौत की अजीब सी नुमाइश करता हो। परिणति का यह कैसा है स्वरूप जो मन को कर देता है … Continue reading पतझड़

टी वी की याद में…

शिमला की गर्मियां गर्मियों जैसी होती ही कहाँ है। सूरज बेशक सर चढ़ के बोले, शाम की शीतल बयार पहाडों में होने का एहसास दिला ही देती है। ऐसे में 1984 की गर्मियों की एक शाम याद है। एक छोटी सी लड़की नीली हरी फ़्रॉक में अपने पापा के पीछे दौड़ रही थी। उसके पापा … Continue reading टी वी की याद में…

खोल दो…

खोल दो भींची हुई मुट्ठियाँ जकड़े हुए अचम्भों के दरवाज़े विस्मय पर लगे ताले। मान लो कि लोमड़ी और गीदड़ का ब्याह है और पहाड़ के पीछे इंद्रधनुष छिपा है। दिखाने दो दिल को उछाल पट पर कलाबाजियाँ सलीके से आखिर मिला क्या है। सहला लो थोड़ी सी बेपरवाहियाँ विवेक में भला ऐसा क्या है। … Continue reading खोल दो…

वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

वो तुम्हारे भीतर वाली दुनिया कभी शांत, स्थिर, मूक सी, आडंबर को ताकते हुए निस्तब्ध रहकर सिद्धी पाती है। कभी अचानक... उपद्रवी सी होकर हंगामा मचाती है। धरातल खंगर सा लगे पर भीतर अश्रु बहाती है। बेदाम, दुस्साहसी बन कर आज़ादी चाहती है। फिर तुम उसका हाथ थाम लेते हो। लम्बा सा सुफियाना कलाम सुनाकर, … Continue reading वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

खुले मैदानों से निकलकर फ़हरिस्तों मे कैद हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई सीलन भरी दीवार पर धूप की लकीर खींचा करती थी ज़िन्दगी कभी थोड़े मे ही खुशियां सींचा करती थी आज बेहिसाब बकिट लिस्टों के बारे मे हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई हर एक … Continue reading फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

तेरा आशय महान है

तेरा कर्म उड़ान है, प्रतिफल नही तेरा आशय ही महान है। सतह का स्पर्श विराट नही स्पर्श का स्वप्न देखना विशाल है। अंत मे अनंत हो ज़रूरी तो नही, अनंत की संभावना जगाना ही कमाल है। चांद का कद ऊँचा ही सही, तेरे हौसले की बुलंदियों पे मुझे अभिमान है। प्रतिफल नही, तेरा आशय महान … Continue reading तेरा आशय महान है

क्यों दंभ हूँ मैं?

मैं तो एक कण हूँ विशाल समय का एक क्षण हूँ, धरातल पर बहता सा एक भ्रम हूँ, शायद मैं छल हूँ, बस आज हूँ नही कल हूँ मैं। मैं अथाह सागर की सिर्फ एक बूंद हूँ, रत्ती भर हूँ रेत मे, मिट्टी नही धूल हूँ, पर्वत की चट्टान नही ज़र्रे सी लुप्त हूँ, ब्रह्माण्ड … Continue reading क्यों दंभ हूँ मैं?