वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

वो तुम्हारे भीतर वाली दुनिया कभी शांत, स्थिर, मूक सी, आडंबर को ताकते हुए निस्तब्ध रहकर सिद्धी पाती है। कभी अचानक... उपद्रवी सी होकर हंगामा मचाती है। धरातल खंगर सा लगे पर भीतर अश्रु बहाती है। बेदाम, दुस्साहसी बन कर आज़ादी चाहती है। मगर तुम उसका हाथ थाम लेते हो लम्बा सा सुफियाना भाषण देकर, … Continue reading वो, तुम्हारे भीतर वाली दुनिया

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फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

खुले मैदानों से निकलकर फ़हरिस्तों मे कैद हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई सीलन भरी दीवार पर धूप की लकीर खींचा करती थी ज़िन्दगी कभी थोड़े मे ही खुशियां सींचा करती थी आज बेहिसाब बकिट लिस्टों के बारे मे हो गई ज़िन्दगी न जाने कब आंकड़ों मे खो गई हर एक … Continue reading फ़हरिस्तों वाली ज़िन्दगी

तेरा आशय महान है

तेरा कर्म उड़ान है, प्रतिफल नही तेरा आशय ही महान है। सतह का स्पर्श विराट नही स्पर्श का स्वप्न देखना विशाल है। अंत मे अनंत हो ज़रूरी तो नही, अनंत की संभावना जगाना ही कमाल है। चांद का कद ऊँचा ही सही, तेरे हौसले की बुलंदियों पे मुझे अभिमान है। प्रतिफल नही, तेरा आशय महान … Continue reading तेरा आशय महान है

क्यों दंभ हूँ मैं?

मैं तो एक कण हूँ विशाल समय का एक क्षण हूँ, धरातल पर बहता सा एक भ्रम हूँ, शायद मैं छल हूँ, बस आज हूँ नही कल हूँ मैं। मैं अथाह सागर की सिर्फ एक बूंद हूँ, रत्ती भर हूँ रेत मे, मिट्टी नही धूल हूँ, पर्वत की चट्टान नही ज़र्रे सी लुप्त हूँ, ब्रह्माण्ड … Continue reading क्यों दंभ हूँ मैं?

किताबों की नौकरी!

विनोद बाबु किताबों पर पड़ी धूल झाड़ रहे थे। तीस सालों से शिमला की स्टेट लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन थे पर आज उनका यहां आखिरी दिन था। 'अगर एक महीने में आप एक भी मेंबर बना पाए तो हम लाइब्रेरी बंद नही करेंगे।' ऐसा कहा था डायरेक्टर साहब ने। पर इंटरनेट के ज़माने में किसे मेंबर … Continue reading किताबों की नौकरी!

बदलाव

इस नए साल के आगमन पर मैंने ज़्यादा संदेश नहीं भेजे। न ही ज्यादा लोगों को फोन किया । दरअसल यह नया साल मेरे जीवन में भी काफी कुछ नया लेकर आया तो उसी उधेड़ बुन में व्यस्त थी। कुछ अजीबोग़रीब सी स्थिति लग रही थी । यहाँ एक पूरा वर्ष पलट रहा था । … Continue reading बदलाव

मुझे भ्रम है

यूँ ही एक भ्रम सा पाल रखा है कि जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है और स्थायी भी । हिमालय की ऊँचाईयों पर बसने वाले जीव शायद ही घाटियों की खोज खबर रखते हैं। और कहीं पहुँचने की जल्दी में भागती हुई नदी क्या जाने कि पर्वत की भाँति अचल रहना भी कुछ होता है। … Continue reading मुझे भ्रम है