बड़े शहरों में मेरा मन नही लगता

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बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता
यहाँ जगमगाते बल्ब
दफ़्न करते हैं पहाड़ों की धाम
चटकनियों के सहारे
खिड़की और दरवाज़े
सलामत रखते हैं
बहुतायत, दिखावा और मायूसी
ठंडी बयारें पंखे का टेक लगाए
दबे पाँव ही आती हैं
बाग़ी हवाओं को यहाँ
आशियाँ नही मिलता
बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता
उठती है टीस रोज़ ही
इनके बाज़ारों में
जहाँ बिकते हैं मख़मली कुर्ते
और मुफ़लिसी है विचारों मे
शक-ओ-शुबह की गिरफतें यहाँ
चाहो भी तो भरोसेमंद नही दिखता
मुझे बड़े शहरों में अपनापन नही मिलता
इनकी ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता

30 thoughts on “बड़े शहरों में मेरा मन नही लगता”

  1. So true, Sonia ji. Bade shehro mein mano kisi ko kisi or ki padi hi nahi hai. Insaan toh bohot hai magar insaaniyat kahi kho gayi hai. Chhote shehro mein thoda apnapan baki hai abhi.
    Beautifully penned.

  2. Bahot sundar दोस्त

    मेरी एक कविता याद आ गई

    कुछ पंक्तियां

    ऊँची इमारतें
    बेमतलब की बातें
    दिखावे में कटता यौवन
    गुलामी के गीत गाये जीवन
    छणिक खुशियों का मोहताज नही मैं
    शायद इसीलिए आकर्षण वाला जीवन रास नही मुझे

    गतिमयता नही जड़ता आती रास है
    आकर्षण नही अलौकिकता इक आस है
    पक्के पथरीले नही कच्चे रास्तों से है मोह
    अमृत की प्यास नही विष हरने पर है जोर 😃❤🌼

  3. अपना शहर जो उस समय ‘छोटा’ था ,
    याद बहुत आता है, छूट जाने के बाद।

    यह तो आपने मन की बात कह दी सोनिया जी।

  4. I so agree with you, Sonia. Being a small town girl, I often feel lost. Bade shehron me na wo apnapan lagta hai na wo mehek. Wahan jeete the ab sirf bhag rahe hain. My extended family lives in my hometown which is in UP. Ek chhota sa district and every time they crib about their life, I tell them what luxuries they have that I don’t, even after staying abroad. Very beautifully penned.

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