बड़े शहरों में मेरा मन नही लगता

Image: Unsplash

बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता
यहाँ जगमगाते बल्ब
दफ़्न करते हैं पहाड़ों की धाम
चटकनियों के सहारे
खिड़की और दरवाज़े
सलामत रखते हैं
बहुतायत, दिखावा और मायूसी
ठंडी बयारें पंखे का टेक लगाए
दबे पाँव ही आती हैं
बाग़ी हवाओं को यहाँ
आशियाँ नही मिलता
बड़े शहरों की ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता
उठती है टीस रोज़ ही
इनके बाज़ारों में
जहाँ बिकते हैं मख़मली कुर्ते
और मुफ़लिसी है विचारों मे
शक-ओ-शुबह की गिरफतें यहाँ
चाहो भी तो भरोसेमंद नही दिखता
मुझे बड़े शहरों में अपनापन नही मिलता
इनकी ऊँची इमारतों में
मेरा मन नही लगता

16 Comments on “बड़े शहरों में मेरा मन नही लगता

  1. अपना शहर जो उस समय ‘छोटा’ था ,
    याद बहुत आता है, छूट जाने के बाद।

    यह तो आपने मन की बात कह दी सोनिया जी।

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  2. I so agree with you, Sonia. Being a small town girl, I often feel lost. Bade shehron me na wo apnapan lagta hai na wo mehek. Wahan jeete the ab sirf bhag rahe hain. My extended family lives in my hometown which is in UP. Ek chhota sa district and every time they crib about their life, I tell them what luxuries they have that I don’t, even after staying abroad. Very beautifully penned.

    Liked by 2 people

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