क्यों दंभ हूँ मैं?

मैं तो एक कण हूँ
विशाल समय का एक क्षण हूँ,
धरातल पर बहता सा
एक भ्रम हूँ,
शायद मैं छल हूँ,
बस आज हूँ
नही कल हूँ मैं।
मैं अथाह सागर
की सिर्फ
एक बूंद हूँ,
रत्ती भर हूँ
रेत मे,
मिट्टी नही
धूल हूँ,
पर्वत की चट्टान नही
ज़र्रे सी लुप्त हूँ,
ब्रह्माण्ड मे उल्का सी
भस्म हूँ

फिर भी क्यों दंभ हूँ मैं,
नश्वर हूँ
पर घमंड हूँ मैं।
क्यों
सर्दियों की ठंड मे
सिहरता हुआ
झीना सा अहंकार हूँ?

कुदरत को देखो
तो अल्प हूँ मैं
न्यून सा कोई विकल्प हूँ मैं।
फिर भी क्यों दंभ हूँ मैं
नश्वर हूँ
पर घमंड हूँ मैं।

33 thoughts on “क्यों दंभ हूँ मैं?”

  1. Shubhlakshana

    Wah Sonia … such depth in your poetry …. always wintenessed in your English work but this is so beautiful … feels like reading aloud 👌👌👍👍

  2. singhalkushal

    Beautiful sonia… loved it… in the greater scheme of things; the I is so small but still the I is sooooo big for me….

    1. Thank you Shantanu. I have been travelling for a while now and was left awestruck at the enormity of nature. That led to this poem. Thanks again.

  3. Wowwwwww n a big WOW …Salute to you dear …hum toh aapke fan ho Gaye already …👌👌🙏🙏🙏

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