छोटे शहरों को समर्पित

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छोटे शहर थोड़ा धीरे चलते हैं । शायद उनकी घड़ियों की धड़कने तेज़ नहीं होतीं । धूप सुस्ताते हुए बरामदों में झाँकती है। और सुबह-सुबह सड़कें कुछ चंद ही कदम चलती हैं । धीमे-धीमे सूरज चढ़ता है तो काफिला आगे बढ़ता है । मंज़िलें पास ही होती हैं। फिर भी उन्हें तय करने में घण्टों भी लग जाते हैं ।हर मोड़ पर हाल चाल पूछने वाले जो मिल जाते हैं । बड़े अजीब होते हैं यह छोटे शहर। मैंने इनके चेहरे पर सुकून भी देखा है । मेरे बड़े शहरों वाले मित्र हैरान होते हैं यह जानकर कि छोटे शहर जल्दी सो जाते हैं । दरअसल इन्हें चैन की नींद की आदत सी हो गई है । यह छोटे शहर मुझे सदियों से जानते हैं । मेरे झुर्रियों वाले अक्स को भी पहचानते हैं और मेरी नन्ही हथेलियों वाले प्रतिबिंब को भी । बस शायद इसीलिए छोटे शहरों की रूहें मुझे छू जाती हैं ।

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